डॉ राम मनोहर लोहिया देश के नेताओं में एक ऐसा नाम हैं, जिनकी सक्रियता और विचार-दृष्टि का असर आज भी देश के राजनीतिक और सामाजिक जीवन में है. यूपी में फैजाबाद जिले के अकबरपुर में जन्मे डॉ लोहिया ने अपने कस्बे, बनारस और कोलकाता में शुरुआती पढ़ाई के बाद बर्लिन से अर्थशास्त्र में डॉक्टरेट की डिग्री हासिल की. उनके पीएचडी शोध का विषय था ‘भारत में नमक पर कर’, जर्मनी में उन्होंने मार्क्स व हेगेल के विचारों के अध्ययन के साथ पश्चिम की लोकतांत्रिक परंपराओं को समझा. 1933 में भारत लौटने तक डॉ लोहिया देश और यूरोप में अपनी राजनीतिक गतिविधियों से एक पहचान बना चुके थे. राम मनोहर लोहिया ने अपने जीवन के लगभग चार दसक राजनीती में बिताये । जब वो देश के लिए सच्ची राजनीति कर रहे थे तब देश के लोगो ने उनकी विचारधारा का मूल्य नहीं समझा और जब देश को उनकी याद आई तो लोहिया नहीं रहे । लोहिया एक ऐसे पुरुष थे जिन्होंने देश के लिए न जाने कितने समर्पण किये , कितने अभियान चलाये । लोहिया ही अकेले ऐसे देशभक्त हुए है जिसने कांग्रेस सरकार में रहते हुए उस समय के प्रधानमंत्री नेहरू के खिलाफ लोकसभा में संवाद किये । उनका एक स्लोगन तीन आना वनाम पच्चीस हज़ार रूपये काफी चर्चा में रहा , लोहिया कहते थे की जिस देश का मज़दूर सारे दिन मेहनत करके तीन आना कमाता है उस देश का प्रधानमंत्री पच्चीस हज़ार रूपये प्रतिदिन खुद पर खर्च कर देता है वो भी बिना कमाई किये । यु तो लोहिया ने उस समय की भारत की ही नहीं अपितु विश्व भर की समस्याओ को उजागर किया, मगर उनका मुख्य अभियान असमानता के खिलाफ था । चाहे वो किसी भी छेत्र में रहा हो । लोहिया ने बहुत क्रांतियां की वो सभी बेइंसाफी के खिलाफ बेवाक विचार रखते थे , उन्होंने एक साथ सात क्रांतिओ का आह्वान किया ।
1. नर-नारी में असमानता के प्रति
2. जन्मजात जातिप्रथा के खिलाफ
3. परदेशी गुलामी के खिलाफ एवं विश्व लोक सरकार के लिए
4. रंगभेदी असमानता के खिलाफ
5 . पूंजीवाद के खिलाफ और आर्थिक समानता के लिए
6. निजी जीवन में हस्तछेप के खिलाफ और लोकतान्त्रिक पद्ति के लिए
7 . अस्त्र शस्त्र के खिलाफ और अहिंशा के लिए
इन सात क्रांतियों को लोहिया ने मोटे तोर पर कहा की ये क्रांतियां है जो मुख्यता पुरे संसार में एक साथ चल रही है । लोहिया गांधी के सत्याग्रह और अहिंसा के समर्थक थे पर गाँधीवाद को अधूरा दर्शन मानते थे , लोहिया समाजवादी विचारो के थे परंतु मार्क्स की विचारधरा को एकांगी मानते थे , वे राष्ट्रवादी थे परंतु विश्व को एक सरकार के अधीन देखना चाहते थे । उनकी चिंतनधारा देश काल की सीमाओं तक सीमित नहीं रही । राजनीति के साथ-साथ संस्कृति, इतिहास तथा साहित्य के विषयों में भी उनकी प्रबल विचारधारा होती थी । वे समाजवाद और लोकतंत्र को एक-दूसरे का पूरक मानते थे । वे स्वभाव और कर्म दोनों से विद्रोही थे । अन्याय के विरुद्ध लड़ना उनके सिद्धांत और कर्म की आधारशिला रहा ।
समाज को हिन्दू जाति व्यवस्था से कैसे मुक्त किया जाए, इस संबंध में राममनोहर लोहिया की सोच को उनके जीवन के अनुभवों और विशेषकर उनके राजनीतिक संघर्ष ने आकार दिया था। इस मुद्दे पर उनका व्यावहारिक दृष्टिकोण, जाति पर विचार करने वाले उनके समकालीन अध्येताओं से उन्हें अलग करता है।जहां गांधी महिलाओं को एक अलग इकाई मानते थे-दूसरा लिंग-वहीं लोहिया उन्हें जातिग्रस्त समाज के हिस्से के रूप में देखते थे। लोहिया की यह स्पष्ट मान्यता थी कि कोई भी समाज तब तक प्रगति नहीं कर सकता जब तक कि उसकी आधी आबादी को विकास की प्रक्रिया में हिस्सेदारी करने की स्वतंत्रता और अवसर उपलब्ध न होगी
उनका व्यावहारिक दृष्टिकोण, ठोस विश्लेषण पर आधारित था। उनका यह मानना था कि जाति व्यवस्था ने समाज को दो नहीं बल्कि अनेक स्तरों पर बांट दिया है। वे इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि जाति व्यवस्था ने केवल समाज के एक तबके को ही तिरस्कृत नहीं किया है वरन् उसने पूरे समाज को ही दूषित कर दिया है। पदक्रम व जाति-आधारित व्यवस्था से ‘नीची जातियां’ ही नहीं वरन् महिलाएं भी पीडि़त और प्रताडि़त हैं। जाहिर है कि लोहिया ने जाति-व्यवस्था के समाज पर प्रभाव का गहराई से अध्ययन किया था।
डॉ लोहिया ने देश के निर्माण कार्य के लिए सलाह मस्वरे हेतु डॉ भीमराव आंबेडकर से पत्राचार करते रहते थे , खुद अम्बेडकर ने लोहिया के बारे में क्या कहा था यह बात हा जब एक बार बुद्धप्रिय मौर्य बाबा साहेब से मिलने गए तब मौर्य केंद्रीय मंत्री ही नहीं बल्कि एक चर्चित दलित नेता भी थे।मौर्य ने लिखा कि ‘ सन् 1951 में अम्बेडकर ने पूछा कि तुम डा.राम मनोहर लोहिया को जानते हो ? मैं चुप रहा। बाबा साहेब ने कहा कि तुम क्या खाक पालिटिक्स करोगे, जब तुम डा.लोहिया को नहीं जानते। हिंदुओं के एक ही तो नेता हैं जो ईमानदारी से जात-पांत तोड़कर जातिविहीन समाज की स्थापना करना चाहते हैं। बाबा साहेब अक्सर कभी किसी की प्रशंसा नहीं करते थे। इस मामले में वे बड़े कंजूस थे।
किसी लेखक ने सही ही कहा है की लोहिया उस बहती नदी की निर्मल धारा थे जिसमे कोई भी ब्यक्ति डुबकी लगा कर अपने मन और आत्मा को तजा कर सकता है । कहा जाये की लोहिया के विचार उस हवा के सामान है जब जंगल के बीच जे गुजरती है तो लोगो को अहसास नहीं होता पर जब मैदानी इलाको से गुजरती है तो तूफान का रूप ले लेती है , आज ऐसी ही जरूरत आन पड़ी है की उन महान विचारो को मैदानों से वहना होगा । उस ज़माने में लोहिया का लोगो तक नहीं पहुच पाने का मुख्या कारण मीडिया का सहयोग न होना रहा । तब लोहिया केवल एक ही बात कहते थे कि सारा देश टूटा हुआ है । देश की आत्मा टूट चुकी है । मै जानना चाहता हूं की दुनिया में कोई और भी देश ऐसा रहा है जो इतना टूटा है जितना हिंदुस्तान ?
लोहिया कहते थे " लोग मेरी बात सुनेगे, और जरूर सुनेगे, शायद मेरे मारने के वाद । आज नए नेतृत्व और लोगो में नई खूबियों की जरूरत है । बहुत आराधना हो चुकी , फूल चढ़ाना और यशोगान भी हो चुका ।..... नेता रहेगे, अनेक नेता रहेगे, एक नेतृत्व भी रहेगा । वह असली नेता लोगो पर अधिक जादू कर सकेगा।.....लेकिन नया नेतृत्व और नए लोग राष्ट्रीय व अंतर्राष्ट्रीय स्तर के नहीं, गांव के स्तर के होंगे ।
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