TRENDING
May 17 › और वो पीड़ा लक्ष्य में बदल गयी! »May 17 › इस घटना से कितने लोगों के दिल दहले? »May 17 › इस्लामिक साम्राज्यवाद एवं उसका विस्तार : एक विश्लेषण »May 16 › भारत के आदिवासी क्षेत्रों में आर्य समाज »May 16 › क्या यूरोप अपने अंत के निकट है ? »May 16 › अपने बिशपों-पादरियों के यौन शोषण से बचाओ, »May 16 › सार्वदेशिक सभा के द्वारा संगठन का एक और प्रशंसनीय प्रयास अण्डमान में आर्य समाज की स्थापना »May 16 › आर्यसमाज वजीरपुर दिल्ली द्वारा सम्मानित किए जाने के लिए आर्यसमाज के यशस्वी विद्वान नेता श्री धर्मपाल आर्य जी को बधाई’ »May 16 › ‘ईश्वर-जीवात्मा का परस्पर संबंध और ईश्वर के प्रति मनुष्य का कर्तव्य’ »May 16 › ‘श्रेय मार्ग में प्रवृत्ति व प्रेय मार्ग में निवृत्ति ही मनुष्य का कर्तव्य’ »
आइये जाने भारत के राष्ट्रवादी ओजस्वी पुरुष भीमराव आंबेडकर के बारे
SEP 27 • SAMAJ AND THE SOCIETY • 267 VIEWS • NO COMMENTS
(No Ratings Yet)
विषय- आइये जाने भारत के राष्ट्रवादी ओजस्वी पुरुष भीमराव आंबेडकर के बारे
जिन्हें आज बामसेफी/बहुजन/नमो बुधाय/जय भीम वालो ने इतना निचे गिरा दिया है की ये नाम अब स्वर्ण हिन्दू के लिए हिन्दू धर्म के लिए नफरत पैदा करता है
आज इनकी छवि समाज में इतनी गिरा दी गयी है जैसे भारत में इन्होने ने ही हिन्दुओ का बटवारा किया।
बाबा शाहब ने कुछ गलतिया जरुर की इन्शान थे गलतिया हो जाती है भगवान् नही थे बाबा शाहब जो गलती नही होगी फिर भी उनकी गलती इतनि बड़ी नही थी की दुरात्मा गाँधी से निम्न माने जाय और गाली दिए जाय।
ये लेख उन महापुरुषों के लिए भी है जिन्हें जय भीम- जय मीम ( दलित मुस्लिम ) गठजोड़ पसंद है
ये लेख उनके लिए भी जो कहते है बाबा शाहब हमेशा हिन्दुओ का विरोध किये और हिन्दू संस्कृति का विरोध किये आपको जानकार हैरानी होगी वो बाबा शाहब ही थे जो संस्कृत को राष्ट्रभाषा बनाना चाहते थे मगर प्रस्ताव् खारिज हो गया
||बाबा शाहब एक शुद्ध राष्ट्रवादी व्यक्ति थे||
======================
हिंदुस्तान के बटवारे के वक्त एक दलित लीडर हुआ करते थे, बाबासाहेब भीमराव अंबेडकर से बड़े दलित लीडर …. जनाब का नाम था जोगेंद्र नाथ मंडल । बाबासाहेब से भी बड़े दलित नेता इसीलिए कहा… क्योंकि 1945-46 जब संविधान-निर्माण समिति के लिए चुनाव हुए तो बाबासाहेब बंबई से चुनाव हार गए, ऐसे मे वे जोगेंद्र नाथ मंडल ही थे जिन्होने बाबा साहेब को बंगाल के कोटे से जितवाया ।
दलित-मुस्लिम गठजोड़ और जय भीम-जय मीम का नारा देने वाले आपको कभी जोगेंद्र नाथ मंडल का नाम लेते नहीं दिखेंगे । क्योंकि यह एक नाम इस बेमेल गठजोड़ के पीछे की खतरनाक शाजिश की धज्जियाँ उड़ा देगा ।
आजादी से पहले मंडल डॉ. अंबेडकर की तरह दलित आंदोलन के प्रमुख चेहरा थे। पश्चिम भारत के दलितों पर जहाँ बाबा साहेब का प्रभाव था, वही पूर्वी अविभाजित भारत की सियासत में मंडल ने दलितों का नेतृत्व किया । ( एक बात स्पष्ट कर दूँ की जोगिंदर नाथ मण्डल, डॉ. अम्बेडकर के राजनैतिक गुरु भी थे )
इतिहास मे पहली बार दलित-मुस्लिम गठजोड़ का प्रयोग जोगेंद्र नाथ मंडल ने ही किया था, डॉ अंबेडकर से उलट उनका इस नए गठबंधन पर अटूट विश्वास था। मुस्लिम लीग के अहम नेता के तौर पर उभरे जोगेंद्र नाथ मंडल ने भारत विभाजन के वक्त अपने दलित अनुयायियों को पाकिस्तान के पक्ष मे वोट करने का आदेश दिया। अविभाजित भारत के पूर्वी बंगाल और सिलहट (आधुनिक बांग्लादेश) में करीब 40 प्रतिशत आबादी हिंदुओं की थी, जिन्होने पाकिस्तान के पक्ष मे वोट किया और मुस्लिम लीग मण्डल के सहयोग से भारत का एक बड़ा हिस्सा हासिल करने मे सफल हुआ ।
आज के बांग्लादेश इलाके से लाखों सवर्ण और अमीर जातियों ने हिंदुस्तान मे बसने का फैसला किया, जबकि मण्डल के दलित-मुस्लिम दोस्ती के बहकावे मे ज़्यादातर दलितों ने पूर्वी पाकिस्तान मे (आज का बांग्लादेश) ही बसने को राजी हुए ।
विभाजन के बाद मुस्लिम लीग ने दलित-मुस्लिम गठजोड़ का मान रखते हुए मंडल को पाकिस्तान का पहला कानून मंत्री बनाया, बल्कि पाकिस्तान के संविधान लिखने वाली कमेटी के अध्यक्ष भी वही रहे थे। जोगेंद्र नाथ मंडल ने वैसे ही पाकिस्तान का संविधान रचा है जैसे बाबासाहेब ने भारत का संविधान।
पर शाजिश की दोस्ती कहाँ ज्यादा दिन टिकती ……
अब मुस्लिम लीग को वैसे भी दलित-मुस्लिम दोस्ती का ढोंग करने की जरूरत नहीं रह गयी थी । उनके लिए हर गैर-मुस्लिम काफिर है । पूर्वी पाकिस्तान मे मण्डल की अहमियत धीरे-धीरे खत्म हो चुकी थी । दलित हिंदुओं पर अत्याचार शुरू हो चुके थे । 30% दलित हिन्दू आबादी किजान-माल-इज्जत अब खतरे मे थी ।
मण्डल ने दुखी होकर जिन्ना को कई पत्र लिखे, उनके कुछ अंश पढ़िये :-
—————————————————————–
मंडल ने हिंदुओं के संग होने वाले बरताव के बारे में लिखा, “मुस्लिम, हिंदू वकीलों, डॉक्टरों, दुकानदारों और कारोबारियों का बहिष्कार करने लगे, जिसकी वजह से इन लोगों को जीविका की तलाश में पश्चिम बंगाल जाने के लिए मजबूर होना पड़ा.” । गैर-मुस्लिमों के संग नौकरियों में अक्सर भेदभाव होता है. लोग हिंदुओं के साथ खान-पान भी पसंद नहीं करते. !
पूर्वी बंगाल के हिंदुओं (दलित-सवर्ण सभी ) के घरों को आधिकारिक प्रक्रिया पूरा किए बगैर कब्जा कर लिया गया और हिंदू मकान मालिकों को मुस्लिम किरायेदारों ने किराया देना काफी पहले बंद कर दिया था.
————————————————-
जोगेन्द्र नाथ ने कार्यवाही हेतु बार- बार चिट्ठीयां लिखी, पर इस्लामिक सरकार को न तो कुछ करना था, न किया | आखिर उसे समझ आ गया कि उसने किसपर भरोसा करने की मूर्खता कर दी है |
एक समय ऐसा आया जब जोगेंद्र नाथ मंडल का परिवार व उसके समर्थक तथाकथित मूलनिवासी भी इस्लामिक जिहादियों की नजरो से बच न पाये ।
मंडल आखिर में इस नतीजे पर पहुंचे कि पाकिस्तान में हिंदुओं की स्थिति “संतोषजनक तो दूर बल्कि हताशाजनक है और उनका भविष्य पूरी तरह अंधकारपूर्ण है ।
——————————————————————-
1950 में बेइज्जत होकर जोगेंद्र नाथ मंडल भारत लौट आया | भारत के पश्चिम बंगाल के बनगांव में वो गुमनामी की जिन्दगी जीता रहा | अपने किये पर 18 साल पछताते हुए आखिर 5 अक्टूबर 1968 को उसने गुमनामी में ही आखरी साँसे ली ।
मण्डल तो वापस आ गया लेकिन उनके गरीब अनुयायी वहीं रह गये बहुत से मार दिये गये बाकी मुसलमान बन गये । मुसलमान बनने पर भी उनकी समस्याओं का अन्त नहीं हुआ, उन्हें मुसलमानों में अरजल जाति कहा गया, तथा उनसे मैला उठवाने जैसे काम करवाये गये जो लोग कहते है मुस्लिमों में जातिवाद नहीं वो उनसे अशरफ, अजलाफ और अरजल समुदाय के बारे मे पूछें
_____________________________________
एक तरफ दलित-मुस्लिम गठजोड़ के जनक मण्डल का शर्मनाक अंत हुआ और दूसरी तरफ प्रखर राष्ट्रवादी, इस्लाम-कम्युनिस्ट-मिशनरी बिरोधी सच्चे दलित नेता भारत रत्न बन इतिहास मे अमर हो गए । ( बाबा साहब के इस्लाम-बामपंथ-मिशनरी बिरोधी विचार जानने के लिए इस लेख को पढ़ें :-
अब सोशल मीडिया में लाखों की तादाद में बहुजन समाज मौजूद हैं । मूलनिवासी-अंबेडकरवादी-बहुजनवादी न जाने ऐसे कई नामों से ये दलित-पिछड़े बर्ग का प्रतिनिधित्व इस प्लेटफॉर्म पर कर रहे हैं । पर इनमे बाबासाहेब डॉ अंबेडकर जैसी प्रखर राष्ट्रवाद, दूरदृष्टि, दलित-शोषित के उत्थान के लिए एक गंभीर सोच का सर्वथा अभाव है ।
हद से हद वे आपको जयभीम और नमो बुद्धाय का नारा लगाते या फिर बाबासाहेब के पारिवारिक अलबम तक सीमाबद्ध दिखेंगे । और अगर मिशनरी या जमात वालों ने इनके माथे पर हाथ फेर दिया तो फिर वे आपको मनुस्मृति-ब्राह्मण सहित सभी सवर्ण जतियों को ही नहीं हिन्दू धर्म- संस्कृति-देवी-देवता को गाली-गलौजकर बड़े अंबेडकरवादी बनते दिखेंगे । हैरत तो तब होती है जब शांति-प्रेम-करुणा के प्रतीक भगवान बुद्ध को एक पल नमोबुद्धाय कहने वाले नव-बौद्ध अगले ही पल हिन्दु धर्म को गाली दे भगवान बुद्ध और बाबासाहेब दोनों को शर्मिंदा करते नजर आते हैं ।
इन अंबेडकरवादियों ने न बाबासाहब को जाना, न उनको पढ़ा- न समझा । बाबा साहेब रचित कंटेन्ट को तो ये कभी हाथ नहीं लगाते । जमात-कम्युनिस्ट और मिशनरी के हाथों की कठपुतली बनने से पहले काश इनहोने बाबा साहेब के इन लोगों के बारे मे सोच पढ़ा होता ।
1) कम्युनिस्ट बामपंथ बिरोधी बाबा साहेब :-
—————————————-
कम्युनिस्टों के बाबा साहेब हमेशा ही घोर विरोधी रहे क्योंकि वे व्यक्ति की स्वतन्त्रता के प्रबल पक्षधर थे जबकि कम्युनिस्ट विचारधारा व्यक्ति की स्वन्त्रता की विरोधी है। साथ ही बाबा साहेब को कम्युनिस्ट पार्टी के सारे पदाधिकारी ऊंची जाति और विशेषकर ब्राह्मण होने पर भी एतराज था । उनका मानना था कि कम्युनिस्ट सामाजिक भेदभाव और गरीबी को हटाने के मामले मे ईमानदार नहीं है । पश्चिम बंगाल, केरल और त्रिपुरा मे लंबे समय तक रहे वामपंथी शासन की कारगुजारी बाबा साहेब के इनके बारे में आंकलन को सही साबित करती है ।
25 नवम्बर 1949 को संविधान सभा में बोलते हुआ बाबा साहब ने कहा था, “वामपंथी इसलिए इस संविधान को नही मानेंगे क्योंकि यह संसदीय लोकतंत्र के अनुरूप है और वामपंथी संसदीय लोकतंत्र को मानते नही हैं।
2) इस्लाम मिशनरी बिरोधी बाबा साहेब :-
———————————————–
1945 में अपनी पुस्तक “थॉट ऑन पाकिस्तान“ में उन्होंने जो विश्लेषण किया उसका सार ये है कि मुसलमान सामाजिक सुधारों के विरोधी हैं। इस्लाम जिस भाईचारे की वकालत करता है वह दुनिया के सब मानवों का भाईचारा नहीं है। वह केवल मुसलमानों का मुसलमानों के लिए भाईचारा है । गैर मुसलमानों के लिए वहाँ केवल घृणा और शत्रुता है। साथ ही इस्लाम किसी भी मुसलमान को ये इजाजत नहीं देता कि वह किसी गैर इस्लामी देश के प्रति वफादार रहे। इस स्थिति में बेहतर है कि पाकिस्तान बनने दिया जाये पर आबादी की अदला बदली पर योजना बना ली जाए क्योंकि मुस्लिम बहुल क्षेत्रों मे गैर मुसलमानों के लिए इज्ज़त और बराबरी से जीवन जीना संभव नहीं है ।
3) मिशनरी बिरोधी बाबा साहेब :-
————————————
न केवल इस्लाम वाले बल्कि मिशनरी वालों ने भी बाबा साहेब पर डोरे डालने का भरसक प्रयास किया, पर बाबा साहेब ने कहा बौद्धमत भारतीय संस्कृति का ही अभिन्न अंग है। मैंने इस बात कि सावधानी बरती है कि इस मतांतरण के कारण इस भूमि कि परंपरा और इतिहास को कोई आंच ना आए । ईसाईयत मुझे भारतीयता से दूर कर देगी ।
—————————————————————–
समान नागरिक संहिता के प्रबल समर्थक थे बाबा साहेब, कश्मीर से धारा 370 की समाप्ति और संस्कृत को राजभाषा बनाने की मांग उन्होने रखा था (10 सितंबर 1949 को डॉ बी.वी. केस्कर और नजीरूद्दीन अहमद के साथ मिलकर बाबा साहब ने संस्कृत को राजभाषा बनाने का प्रस्ताव रखा था, लेकिन वह पारित न हो सका )
धर्मनिरपेक्षता के सच्चे मिसाल बाबा साहेब ने संविधान मे कभी “SECULARISM” शब्द जोड़ने की जरूरत नहीं समझा । शिक्षित बनो-संगठित बनो, संघर्ष करो के बाबा साहेब के नारे मे से इन्होने अंतिम शब्द संघर्ष करो (दूसरे के हाथों का खिलौना बन ) ही अब तक सीखा ।
जाति मुक्त हिन्दू समाज बनाने का सपना सँजोये इस प्रखर राष्ट्रवादी माँ भारती के रत्न ने आज इन तथाकथित अपने चेले-चपाटे को देख लिया तो ???
इस मैसेज को आगे शेयर करे
RELATED POSTS
ABOUT THE AUTHOR: DR. VIVEK ARYA
LEAVE A REPLY
Your email address will not be published. Required fields are marked *
Name *
Email *
Website
Comment
Enable Google Transliteration.(To type in English, press Ctrl+g)
« दलित समाज और ईसाई मिशनरीआदिवासी समाज और ईसाइयत »
और वो पीड़ा लक्ष्य में बदल गयी!
MAY 17 • 8 VIEWS
इस घटना से कितने लोगों के दिल दहले?
MAY 17 • 9 VIEWS
इस्लामिक साम्राज्यवाद एवं उसका विस्तार : एक विश्लेषण
MAY 17 • 10 VIEWS
भारत के आदिवासी क्षेत्रों में आर्य समाज
MAY 16 • 8 VIEWS
क्या यूरोप अपने अंत के निकट है ?
MAY 16 • 7 VIEWS
FIND US ON FACEBOOK
READ ABOUT
Official Web Portal
Follow us on twitter
Online TV
Online Radio
Mobile Apps
Terms of use
Privacy
Cookies
Advertise With Us
2,959 Pageviews
Apr. 18th - May. 18th
टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें