धर्म के क्षेत्र में भक्ति आत्मा की मुक्ति का साधन हो सकती है ; परन्तु राजनीति में भक्ति या नायक पूजा पतन और अंततः तानाशाही का सीधा रास्ता है
यह बात बाबा साहेब डॉ0 भीमराव आंबेडकर ने अब से 67 साल पहले 24 नवम्वर 1949 को संबिधान सभा के अपने आखिरी भाषण में कही थी ,उनकी यह बात सच होती भी दिखी 1975 में जब देश में इमरजेंसी लागू हुई थी तब लोगो ने कहा था कि " indra is india" मतलब कोई भी ब्यक्ति जिसको आप अंधभक्ति के चलते देश से भी ऊपर ले जाते है तो देश का पतन हो जाता है , और यही आज भी देखने को मिल रहा है ,
और आज का आलम तो ऐसा है जिसको इस राष्ट्र में केवल अपमान , गरीवी , भुखमरी, वेरोजगारी, छुआछूत, बलात्कार, बाल मजदूरी , कुपोषण जेसी चीजे मिली उनको राष्ट्रभक्ति का नया चूरन दिया जा रहा है और लोग इसको नया ब्रांड समझ खूब चटकारे लिए जा रहे है ,
जबकि कोई राष्ट्र अपने लोगो को रोटी, रोजगार , स्वास्थ, समता, सम्मान , शिक्षा देने में सफल होता है तब राष्ट्रभक्ति शब्दों में नहीं आत्मा में बसी होती है जिसे चाहकर भी कोई निकाल नहीं सकता , और भारत जेसे देश में तो इतने विषय है जिन पर काम करना बहुत ही आवश्यक है की जेसे किसी जख्म पर मरहम , आज के समय में तो मोदी भक्ति इस कदर बडी है की संकर भगवान को भी दिल्ली की सड़को पर आकर तांडव करना पड़ सकता है , क्योकि हम बचपन से सुनते आ रहे है की , हर हर महादेव जो आज हर हर मोदी , बाहर के देशो में ऐसा नहीं होता है वहा केवल सरकार के कार्यो का आकलन किया जाता है , और सरकार के गलत कदम पर वो अपने नेता को सबक सिखाना भी जानते है , जबकि हमारे देश में नेताओ को सवक सिखाने जैसा कोई चेप्टर ही नहीं होता, बस भक्ति होती है , जो नायक के हित में तो हो सकती है मगर देश हित में सावित नहीं होती है ,
मगर लोग अमेरिका में बैठ कर कहते जा रहे है " we proud to be an indian" दे केवल एक दिखावा ही हो सकता है ।
ओशो आंबेडकर चाहते थे कि अछूतो के अपने उम्मीदवार और अपने निर्वाचन क्षेत्र हों, अन्यथा उनका कहीं भी किसी भी संसद में प्रतिनिधित्व कभी नहीं होगा, भारत में एक मोची अछूत है, कौन एक मोची को वोट देंगे? कौन उसे वोट देने जा रहा है? अम्बेडकर बिल्कुल सही थे। देश की एक चौथाई लोग अछूत है। स्कूलों में जाने के लिए उन्हें अनुमति नहीं है, अन्य छात्र उनके साथ बैठने के लिए तैयार नहीं है, कोई शिक्षक उन्हें सिखाने के लिए तैयार नहीं है। सरकार कहती है कि सरकारी स्कूल खुले हैं , लेकिन वास्तविकता में कोई एक अछूत छात्र कक्षा में प्रवेश करता है, तो सभी तीस छात्रों कक्षा छोड़ने को …. तैयार है। शिक्षक वर्ग कक्षा छोड़ देता है, तो फिर कैसे इन गरीब लोगों का — जो इस देश का एक चौथाई भाग हैं – प्रतिनिधित्व किया जा रहा है? इसलिए उन्हें अलग निर्वाचन क्षेत्र दिए जाने चाहिए। जहां केवल वे खड़े हो सकते हैं और केवल वे मतदान कर सकते हों, अम्बेडकर पूरी तरह से तार्किक और पूरी तरह से मानवतावादी थे। लेकिन गांधी, अनशन पर चला गया “उन्होंने कहा कि अम्बेडकर हिंदू समाज के भीतर एक प्रभाग बनाने की कोशिश कर रहे है।” विभाजन दस...
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