भारत जब अंग्रेजो की गुलामी का दौर झेल रहा था तो उस समय कुछ देशभक्त सोच रहे थे की जिस दिन हमारा देश आज़ाद होगा उस दिन हमें असली ऑक्सीजन मिलेगी । और हम अपने नियम कायदे , अपने कानून बनाएंगे और देश में ऐसा सिस्टम होगा कि जब भी देश के हित की बात होगी तो प्रत्येक ब्यक्ति दोनों हाथ उठाकर उसका समर्थ करेगा । और ऐसा हुआ भी 15 अगस्त 1947 को देश आज़ाद भी हुआ और हमारे लोगो ने अपने नियम ,कानून बनाये , पूरी दुनिया के सबसे अच्छे नियमो को इसमें रखा गया । उस समय ऐसा हुआ था की देश के सभी बुद्धिजीविओ को सामिल किया गया और देश निर्माण पर चर्चा हुई और फिर न जाने अचानक ही कांग्रेस जिसका गठन देश को आज़ाद कराने के मकसद से हुआ था के उस समय के मुखिया को देश का प्रधानमंत्री बना दिया , जरा सोचो जब कांग्रेस अपने मकसद में कामयाब हो गई थी तो उसको समाप्त क्यों नहीं कर दिया गया मगर ऐसा हुआ नहीं और नेहरू प्रधानमंत्री बन गए और सारे कानूनों को ताक पर रख अपने बजूद का खूब दुरपयोग करते नज़र आने लगे । फिर जब हद हो गयी तो इसी संगठन के खिलाफ देश ने नज़र उठाई तो देश में आपातकाल घोषित कर दिया गया । और तभी से एक ट्रेंड सुरु हुआ और राजनीतिक पार्टिया अस्तित्व में आने लगी और फिर जनता को ऐसे बाट दिया गया की जनता नेता को न देखकर उसकी पार्टी को देखने लगी । और इसी का फायदा उठाकर गलत लोगो का राजनिति में प्रवेश सुरु हो गया । और आज भी वही हो रहा है जनता को पार्टी का गुलाम बना लिया गया है और अब तो सोशल मीडिया पर भी राजनीतिक पार्टिओ के फेन्स क्लब होने लगे है इसका मतलब उनकी नज़र में उस पार्टी विशेष के सभी सदस्य भगवान हो गए। कल तक जिसने विपक्षी पार्टी में रहते फेन्स से खूब गालिया खाई आज वही दूसरी पार्टी में जाकर उन्ही से वाह-वाही लूट रहा है । आज-कल तो इस अंधभक्ति का स्तर इस कदर बढ़ गया है कि जनता अपने सपोर्टिंग पार्टी के खिलाफ कुछ भी सुनने को तैयार नहीं है । बहुत खूब नेता भी ऐसा ही चाहते थे और वो कामयाब हो गए, अब किसी भी नेता को खुद को जनता के सामने साबित करने की जरूरत नहीं है बस इतना प्रचार करना है कि वो इस पार्टी में शामिल ही गया है , बस फिर पार्टी के सपोर्टिंग फेन उसके सपोर्टर बन जाते है , ये अंधभक्ति नहीं तो क्या है , नेताओ का नेता बनना आसान हो गया है । अगर आज हम एक उदाहरण ले कि नोट बंदी देश हिट में है या नहीं तो समझ जाना की जिनका जवाब हा में है वो बीजेपी या आरएसएस से सम्बन्ध रखता है , और जो सही बताते हुए उसकी बकालत करे भक्त है , और हा अगर अपने पूछ लिया कि पूरा देश परेशान है बैंको में लाइन में खड़ा है और फिर उसका जवाव हो की जब देश का फौजी आपके लिए सीमा पर खड़ा रह सकता है तो आप दो चार घंटे लाइन में नहीं खड़े हो सकते तो ये अंधभक्ति है । अब उसको इतना भान तो है नहीं की उसी लाइन में उस फौजी का बाप, इसकी पत्नी , उसकी बेटी , भी खड़ी है । जिस देश की जनता जब तक अच्छे ब्यक्तित्व को नज़रअंदाज कर पार्टी विशेष के जाल में फसी रहेगी उस देश का अस्तित्व खतरे में नज़र आने लगता है । क्योकि कोई भी राजनितिक पार्टी आदर्श नहीं हो सकती हा उसके कुछ नेता आदर्श हो सकते है जैसे कुछ दूसरी पार्टी में भी हो सकते है और इसी तरह कुछ गलत लोग भी , इसलिए देश की जनता पर भी शक होता है कि वो चाहती क्या है । और नेता अब इस चीज को समझ चुके है बस जनता के समझने की देरी है अंग्रेजो की नीति थी "फूट डालो राज करो " मगर आज अंग्रेज भारत में होते तो हमसे सीखते कि "भक्त बनाओ और राज करो " किसी ने खूब ही कहा है ,
"जिस देश की जनता जैसी होती है
वह वैसा ही नेता चुनती है ।"
ओशो आंबेडकर चाहते थे कि अछूतो के अपने उम्मीदवार और अपने निर्वाचन क्षेत्र हों, अन्यथा उनका कहीं भी किसी भी संसद में प्रतिनिधित्व कभी नहीं होगा, भारत में एक मोची अछूत है, कौन एक मोची को वोट देंगे? कौन उसे वोट देने जा रहा है? अम्बेडकर बिल्कुल सही थे। देश की एक चौथाई लोग अछूत है। स्कूलों में जाने के लिए उन्हें अनुमति नहीं है, अन्य छात्र उनके साथ बैठने के लिए तैयार नहीं है, कोई शिक्षक उन्हें सिखाने के लिए तैयार नहीं है। सरकार कहती है कि सरकारी स्कूल खुले हैं , लेकिन वास्तविकता में कोई एक अछूत छात्र कक्षा में प्रवेश करता है, तो सभी तीस छात्रों कक्षा छोड़ने को …. तैयार है। शिक्षक वर्ग कक्षा छोड़ देता है, तो फिर कैसे इन गरीब लोगों का — जो इस देश का एक चौथाई भाग हैं – प्रतिनिधित्व किया जा रहा है? इसलिए उन्हें अलग निर्वाचन क्षेत्र दिए जाने चाहिए। जहां केवल वे खड़े हो सकते हैं और केवल वे मतदान कर सकते हों, अम्बेडकर पूरी तरह से तार्किक और पूरी तरह से मानवतावादी थे। लेकिन गांधी, अनशन पर चला गया “उन्होंने कहा कि अम्बेडकर हिंदू समाज के भीतर एक प्रभाग बनाने की कोशिश कर रहे है।” विभाजन दस...
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