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कनिका मिश्रा की नोटेबन्दी पर एक रिपोर्ट

Kanika Mishra लिखती है..

"ब्लैक मनी" का जुमला पुराना हुआ, अब नया नारा है "कैशलैस". आप को पता है क्यों? क्योंकि इंडियन एक्सप्रेस में छपी एक रिपोर्ट के अनुसार 27 नवम्बर तक बैंकों में करीब १२ लाख करोड़ के पुराने 500 और 1000 के नोट आ चुके हैं. ये पूरी उम्मीद है कि 30 दिसम्बर की सीमा तक बाकी के 3 लाख करोड़ भी आ जायेंगे. मतलब , 15 लाख करोड़ के पूरे 500 और 1000 के नोट वापस. इसका मतलब ये हुआ कि " ब्लैक मनी" 500 और 1000 के नोट में था ही नहीं. समझदार लोग पहले ही उसे किसी और रूप ( ज़मीन, सोना, डायमंड ) में बदल चुके हैं. शायद, इसलिए नोट जमा करने की समय सीमा अचानक से घटा दी गयी और मोदी सरकार जो सोच रही थी कि जो नोट रिकवर नहीं होंगे उसे काला धन मान के सरकार के प्रॉफिट में जोड़ देंगे, उसका ये प्लान फेल हो गया. ये भी याद रखना है कि नए नोट छपने का खर्चा करीब 1.28 लाख करोड़ तक जाएगा. मतलब खाया पिया कुछ नहीं और गिलास तोड़ा बारह आना. जैसे जेटली जी कल कह ही चुके हैं कि ये समस्या शायद 3 महीने तक खिंचे. तो मतलब पहले 2- 3 दिन की परेशानी बनी 50 दिन , लेकिन अब 50 दिन की जगह 3 महीने. लेकिन एक्सपर्ट की राय माने तो पूरे नोट छपने में करीब 6 महीने लगेंगे और इकोनोमी रिकवर करने में सालों. लोगों की परेशानी, बीमारी , गरीबी, पैसे की कमी से बच्चे, बूढों, रोगियों का मरना, मजदूर , किराने वालों का नुकसान , वो सब तो खैर " A Little Inconvenience" है ही. तो मोदी सरकार समझ गयी है कि हमेशा की तरह " ब्लैक मनी" भी एक जुमला ही निकला और बहुत ज़ल्द पब्लिक ये समझ जायेगी, भले ही सरकारी भोंपू मीडिया इसे दिखाए या न दिखाए. तो नया जुमला फेंका गया " हो जाओ cashless" . मतलब किस किस्म का भद्दा मज़ाक है ये! जिस देश में क्रेडिट कार्ड सिर्फ 2% लोगों के पास है, खाते सिर्फ आधी जनसंख्या के पास है, अंग्रेजी सबकी भाषा नहीं है, जिन गाँवों में ATM तो क्या बैंक्स भी नहीं पहुंचे, आप उनसे कह रहे हो " हो जाओ cashless". संवेदनहीनता की भी कोई सीमा होती है. अरे जो होना होता है, वो हो जाता है, उसके लिए ज़बरदस्ती नहीं करनी पड़ती. राजीव गाँधी का सपना था घर घर टीवी लाना. उन्होंने रामानंद सागर और बी आर चोपड़ा को बुला कर " रामायण" और " महाभारत" टीवी पर प्रसारित करने का प्लान बनाया और घर घर टीवी हो गया. कंप्यूटर आना था, आ गया! नरसिंहराव, मनमोहन सिंह को इंडिया की खिड़कियाँ , दरवाज़े खोलने थे, उन्होंने खोल दिए और देश हमेशा के लिए बदल कर हमें एक ग्लोबल संस्कृति का हिस्सा बना दिया. करने वाले पिछले 10 साल से cashless हैं और इन्टरनेट बैंकिंग कर रहे हैं उन्हें मोदी जी  की सलाह की ज़रुरत नहीं. लेकिन cash को फ्रीज कर के लोगों को मजबूर कर के, आप लोगों को अपग्रेड नहीं बल्कि torture कर रहे हैं. लेकिन जैसे कि शुरू में कहा, शायद " ब्लैक मनी" का मुद्दा हाथ से जाने के बाद अब मोदी सरकार के पास " हो जाओ cashless" नारा ही बचा. आखिरकार 6 महीने लोगों को गुमराह करना है, मजबूरी है.

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